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परदेश जाते पति के प्रति पत्नी की विरह वेदना।


          
निर्मल.....     नीरू कल निकलना होगा मुझे !
नीरू....(अपने कामों में मशगूल बिखरी लटों को कान के पीछे                         
            समेटते हुए)
            इसके प्रत्युतर में #अच्छा कह पाना कितना मुश्किल था।

             बा मुश्किल इतना ही कह पाई कि #इतनी #जल्दी ?

निर्मल....हाँ कुछ अर्जेंट है !

        होंठों पर एक चुप सी थी,पर अंदर एक ख़ामोश सैलाब               उमड़ रहा था। जो निशब्द होते हुए भी शब्दों को भाव दे रहा था।

         नीरू रात में लेटी घड़ी की टिक टिक करती सुई को                             एकटक निहारती,सोचती कि इसमें इतनी आतुरता और
 निरन्तरता क्यों है भागने की? ये मेरी तरह भावों के सदृश                   थक कर ठहर क्यों नही जाती?

 रात की उनींदी, हजार करवटों में अलसाई सी उसके          कामों में साफ दिख रही थी।
   किचन में जाती  तो सोचती कि आई किसलिये लिये थी?
   आलमारी खोलती तो समझ से परे कि खोला क्यों था?

  किचन में उबलती चाय को एकटक निहारते सोचती कि  
 ये चाय की पत्ती अपने गुणों में  इतनी माहिर कैसे है? 
जो दूध को भी अपने रंग में रंग लेती हैं।
    दूध सरीखी मेरा क़िरदार भी बिल्कुल ऐसा ही है। 
    जिसका अपना रंग होते हुए भी बेरंग है।
निर्मल....नीरू कल आलमारी के दराज़ में एक फ़ाइल रखी थी तुमने देखी क्या?
              (आवाज से तंद्रा भंग हो बेमन से)
 नीरू...    आती हूँ.....ओर समान पैक करने लग जाती है।
तुम्हारा टूथब्रश, शेविंग किट, परफ़्यूम (जिसकी सुगंध तुम्हारे होने का एहसास करवाती है) सूंघकर एक गहरी सांस लेते हुए  रख दिया।

रास्ते के लिये के कुछ स्नैक्स, सब्जी पराठा और हाँ वो अचार भी जिसे खाना खाते वक़्त तुमने यूँ ही कह दिया था कि अबकी बार आचार अच्छा बनाया है।ये यूँ ही मेरे लिये इतना खास था कि पूरा का पूरा तुम्हे  समर्पित।
अंततः सूटकेस बन्द कर भीगते आखों के कोर बता रहे रहे थे कि जैसे मेरी सारी खुशियाँ इस सूटकेस में बंद हो।

फिर तुम्हारा शूज पहनना, आते वक्त लेस खोलना ओर जाते वक्त लेस बांधना दोनों ही क्रमशः सुखद अभिव्यक्ति व अवसाद ग्रसित होने का बोध कराती है।
इस विरोधभास की स्थिति की गहराई को काश तुम समझ पाते।

गेट खोल तुम्हे विदा करना और भीगते आँसुओ के कोर को छुपाने की जद्दोजहद...
ओह !कितना मुश्किल है ये मेरे लिये।
फिर पलटकर तुम्हारा यूँ हाथ हिलाना मानो आँसुओ का सैलाब उमड़कर अब बह निकला हो।
तुम्हारी ओझल होती आकृति और मेरे ओट के बीच जैसे ही फासला खत्म हुआ। गेट बंद कर खुद को समझाने की विवशता कुर्सी पर बैठ गहरी सांस लेती है।
फिर छत को एकटक निहारती और टिक टिक करती घड़ी की सुई को देख नजर फेर लेती मानो सारी शिकायतें मेरी तुझी  से है।

फिर मन मे बिखरें भावों और जज्वातो को एक एक कर समेटने लग जाती हूँ।जैसे कोई त्यौहार के बाद घर मे पसरी उदासी को समेटता हो।

                          #सन्तोषप्रेम 
                            04.09.26

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